Monday, August 27, 2007

--संवाद--


किनारे पड़ी
रेत को छूने
उछलती लहरें
मतवाली होकर
दूर से ही
हवा में
शोर मचाती हैं ।
किनारे पहुँच कर
थोड़ा थम जातीं हैं ।
और लौटते हुए
रेत के कानों में
हल्के से
कह जाती हैं
यहीं रुकना
मैं फिर से आती हूँ ।

2 comments:

अंतर्मन | Inner Voice said...

खूबसूरत!

अविनाश वाचस्पति said...

बहुत अच्छे इसमें भाव
जिनका नहीं कोई भाव
बेशकीमती हैं अनमोल
कवियों की जय बोल

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