किनारे पड़ी रेत को छूने उछलती लहरें मतवाली होकर दूर से ही हवा में शोर मचाती हैं । किनारे पहुँच कर थोड़ा थम जातीं हैं । और लौटते हुए रेत के कानों में हल्के से कह जाती हैं यहीं रुकना मैं फिर से आती हूँ ।
शुरु से ही कहानी, कविता पढ़ने और लिखने के प्रति आकर्षण रहा है। आंखों के पीछे, मन के अंदर कई इच्छाएँ जन्म लेती हैं, वहाँ एक अलग दुनिया बसती है। कभी पन्ने पर निकल कर कहानी का रूप ले लेती है तो कभी कविता बन जाती है। पर अक्सर वो जी उठती हैं। लिखने, पढ़ने के अलावा रंगों की दुनिया भी बहुत मन बहलाती है। जैसे लिखना और पढ़ना पसंद है वैसे ही संगीत सुनना भी बहुत भाता है फिर चाहे वह क्लासिकल, भजन, फिल्मी, गज़ल कोई भी प्रकार हो।
2 comments:
खूबसूरत!
बहुत अच्छे इसमें भाव
जिनका नहीं कोई भाव
बेशकीमती हैं अनमोल
कवियों की जय बोल
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