Sunday, December 30, 2007

सराहना




देखा है मैंने
खुले आकाश के,
बांह पसारे
विस्तार को।
नदिया के रुख़ को
मचलते खेलते
बहने को।
हर उषा से
आशा की किरण को
महसूस किया है।
सलाखों के पीछे से
देख-सह-चुप रह कर
जिया है मैंने
हर दिन
हर पल को
और सराहा है उसे
जिसने मुझे यह सब
देखने दिया
चाहे सलाखों के पीछे से ही ।

11 comments:

अनिल रघुराज said...

सलाखों के पीछे से विस्तार की चाहत। सराहना की बूंद को भी सागर समझने का एहसास। अच्छे भाव हैं। नव वर्ष मंगलमय हो।

अजित वडनेरकर said...

नए साल का सलाम...

Sanjeet Tripathi said...

संतोषी प्रवृत्ति

Sanjay said...

नए साल की ढेरों शुभकामनाएँ अर्बुदा.

महावीर said...

नया वर्ष आप सब के लिए शुभ और मंगलमय हो।
महावीर शर्मा

arbuda said...

नव वर्ष की आप सभी को मेरी तरफ से शुभकामनाएँ.

मीनाक्षी said...

आशावादी काव्य का सुन्दर रूप ... बहुत खूब !

vikram said...

सराहनीय़
vikram

जोशिम said...

बहुत ही बढ़िया - सर पीटता हूँ पहले क्यों नहीं पढी - मनीष

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

एक और बेहतरीन काव्य...

vijaymaudgill said...

जिया है मैंने
हर दिन को
हर पल को
और सराहा है उसे
िजसने मुझे यह सब
देखने दिया
चाहे सलाखों के पीछे से ही
क्या बात है यार। जीवन के प्रति तुम्हारा नज़रिया पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा।

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