Saturday, October 27, 2007

उम्मीदें

सन्डे को आपकी छुट्टी है क्या? मुझे दिक्कत होगी अकेले बच्चों के साथ जब रिपेयरिंग का काम करने के लिए लेबर आ जाएगी! याद है पिछले हफ्ते ही तो मकान मालिक ने बोला था, ''सन्डे को आपका काम शुरू हो जाएगा।'' रेवा ने विनीत को याद दिलाया।
''उन्होने कहा था पर ऐसा नहीं होता रेवा। बोलने और होने में बहुत टाइम लगता है। दो तीन महीने तो लग ही जाएँगे। याद है मकान मलिक से बात किये मुझे डेढ़ महीना हो चुका था तब वो पिछले हफ्ते देख कर गये थे, तुम आराम से रहो।'' विनीत थोड़ा गुस्से में बोला।
रेवा भी सोचने लगी कि सही तो कह रहा है विनीत, ऐसा ही होता है। किसे फुरसत है दूसरे का काम याद रखने की, फिर किराया तो मिल रहा है उन्हें। मकानमालिक को क्या चिंता। पिछले किराएदारों ने घर की हालत बहुत खराब कर दी थी। दीवार, दरवाजे, नल, गीज़र सभी को रिपेयरिंग चाहिए थी। यहाँ तक कि फर्श भी इतना गंदा था कि चार घंटे मेड को बुलवा कर साफ करवाया था हमने।
आज सफाई करते हुए रेवा मन ही मन सोच रही थी अभी तीन ही दिन हुए हैं और इन तीन दिनों में सारा काम हो गया। दीवारें, दरवाजे, नल, गीज़र सभी ठीक कर गए लेबर और ज्यादा परेशानी भी नहीं हुई। ''हमने नाहक ही मकानमालिक की गलत धारणा अपने मन में बना ली। शायद सभी एक जैसे नहीं होते, किसी के बारे में पहले से अनुमान लगाना बाद में अक्सर गलत साबित हो जाता है और सच ही तो है कि उम्मीदें छोड़ दो तभी वो पूरी होती हैं।''
आज विनीत जब आफिस से आएंगे तो घर नया सा मिलेगा।

3 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

कड़वे अनुभव सदा से साधक
मीठे मार्ग में बनते हैं बाधक

बोधिसत्व said...

आशा है विनीत को सुव्यवस्थित घर भला लगा होगा....
अलग अनुभव बयान करने के लिए बधाई....

ABHA said...

मीठे पल जीने के लिए, कड़वे पलों का स्वाद चखना ज़रूरी है वर्ना मीठे पलों का महत्व कम हो जाता है.............

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