
Thursday, June 02, 2011
उलझे रास्ते, सुलझी ज़िंदगी

Friday, May 13, 2011
मेरी शाम

पत्तों पर खुरदरी
Monday, May 02, 2011
प्रतिमा मेरे प्रिय की
अन्तस में प्रकाश की
किरणें उत्साह की
मदमस्त मुझे कर
ले चलीं
अनन्त सागर में
उज्ज्वल आँगन में
मौन पावन में...
…छोड़ चलीं...
किरणें प्रकाश की
लहरें उत्साह की
प्रतिमा मेरे प्रिय की।
Thursday, January 27, 2011
क्षणिकाएँ
{ अनुभूति में प्रकाशित पाँच क्षणिकाएँ }
(1)
उड़ते- घुमड़ते
गुज़र जाता है वक्त
साल दर साल
दबे पाँव
छोड़ जाता है
उम्र पर
जाने अनजाने
अपने सफर के निशान।
(2)
उफनती लहरें,
सरसराते पत्ते,
उड़ती हुई रेत
और हमारी साँसें
पिरो रखा है
हवा ने इन्हें
एकसाथ।
(3)
बंद मुट्ठी में
क्या बँध सका
हाथ खोला
और देखो तो
आसमान
सिमट कर
बाहों में आगया।
(4)
मौसम और इंसान
नहीं रहते
एक समान
वक्त के साथ
बदलते हैं
दोनों ही।
(5)
दो लोगों के बीच
ज़रूरी नहीं
शब्द और ज़ुबान हो
रिक्त आवाज़ को
बिन कहे बात को
दिल भी अक्सर
सुन लेता है।
Tuesday, October 26, 2010
मृत्युँजय

मन त्यौहारों की उमंग में रमा हुआ है। रामलीला, दशहरा, दीवाली फिर गोवर्धन पूजा। द्वापर और त्रेता युग दोनों का ही संबंध हो जाता है इस माह से। घर में सफाई करते हुए शिवाजी सावंत का लिखा उपन्यास 'मृत्युँजय' हाथ लग गया है। कुछ सालों पहले जब इसे पढ़ना शुरू किया था तब भी एक अलग आकर्षण सा महसूस किया था। पूरा उपन्यास बिना रुकावट के पढ़ डाला था। २३-२४ साल की आयु में अपना पहला उपन्यास इतने गम्भीर पात्र को लेकर लिखने वाले के दिल-दिमाग पर दानवीर कर्ण और महाभारत काल किस नशे जैसा रहा होगा कि उस नशे के चलते उन्होने अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं की। नशा ऐसा कि उसका असर आज भी पढ़ने वाले को महसूस हो जाता है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि चार-पाँच वर्षों में ही इसके चार संस्करण तथा पचास हज़ार प्रतियाँ प्रकाशित हो गईं। जब मैंने खरीदा था तब तक इसके तीस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे। कोई दैवीय शक्ति जैसे इस उपन्यास को उनसे लिखवाती रही। और शिवाजी के शब्दों में 'यह उपन्यास मेरा नहीं अब पाठकों का हो चुका है।'
Wednesday, October 20, 2010
यादें
Sunday, May 09, 2010
कुछ शाइरी माँ के नाम

Thursday, May 06, 2010
किरणें रवि की ...

Tuesday, April 27, 2010
"द ग्रेट पोइट्री रीडिंग डे" या " मेरी वापिसी"
बहुत दिनों से सोच रही थी कि ब्लागजगत पर लिखने के अभ्यास में एक अंतराल आ रहा है। अंतराल की परिभाषाएँ हर एक के लिए अलग-अलग होती हैं पर निश्चित रूप से एक साल का अंतराल लंबा होता है। इस बीच बहुत कुछ पढ़ा, कुछ और जगह लिखा भी...पर स्लीपींग ब्लागर की श्रेणी में आने के बाद यहाँ से एक अच्छी स्लीप (ब्रेक) की ज़रूरत को मैंने नज़रअंदाज नहीं किया। वैसे ब्रेक के बाद तरोताज़ा होकर लौटने का आनन्द ही अलग है। लौटना कब और कैसे होगा, दिल इसी असमंजस में था पर देखिये ना! कभी-कभी संयोग भी कैसे बन जाता है।
आज "द ग्रेट पोइट्री रीडिंग डे" पर उन सभी कवियों को बार-बार याद कर रही हूँ जिनकी कविताएँ बचपन से पढ़ी हैं, कुछ तो गहरी दिल में उतर गई हैं। हरिवंशराय बच्चन और मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ पढ़ कर उनके प्रति एक सम्मान और प्रेम का रिश्ता दिल में कायम है। मैथिली जी की कविता "दोनों ओर प्रेम पलता है" उस समय मुझे काफी छू गई जब पहली बार पढ़ी थी इस कविता में उन्होनें लक्ष्मण के वन में चले जाने के बाद उर्मिला के दिल में उठ रहे विरह भावों को शब्दों में ढाला है। जब यह कविता पहली बार पढ़ी तब हैरान रह गई थी यह सोच कर कि इस पहलू के बारे में मैथिली जी ने इतनी गहराई से लिख डाला है जिस पहलू पर शायद किसी की नज़र न जाती। हालांकि उस समय मैं छोटी थी पर दिल में आज भी यह कविता उतना ही गहरा अर्थ समझा जाती है।
हरिवंशराय बच्चन की एक कविता "नीड़ का निर्माण फिर फिर" भी उन कविताओं में से एक है जो मेरी डायरी में नोट की हुई है, ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं पर चाहती हूँ कि आज के दिन आपके साथ इस कविता को बाँटू। उम्मीद है कि निर्माण की बात कहती इस कविता के बाद मुझे सहर्ष वापिसी मिल जाएगी...
नीड़ का निर्माण फिर फिर, नेह का आह्वान फिर फिर
यह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अँधेरा
धुलिधुसर बादलों ने धरती को इस भाँती घेरा
रात सा दिन हो गया फिर रात आई और काली
लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा
रात के उत्पात-भय से भीत जन जन भीत कण कण
किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर .....
क्रुद्ध नभ के वज्रदंतो में उषा है मुस्कुराती
घोर-गर्जनमय गगन ने कंठ में खग-पंक्ति गाती
एक चिडिया चोंच में तिनका लिए जो जा रही हैं
वह सहज में ही पवन उनचास को नीचा दिखाती
नाश के भय से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता में सृष्टि का नवगान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर....
कवि - हरिवंशराय बच्चन
Monday, May 11, 2009
सपना

पलकों के पीछे
चुप चुप के
सपना सलोना।
रात भर
आकार लेता,
न जाने कब कहीं
खो गया।
पलकों में ही घुल गया,
या, रौशनी से डर गया,
बहुत ढूँढा
फिर लगा,
अपनी कहानी
वो जी गया।
Sunday, November 09, 2008
कसक
एक लम्हा चुरा लूँ
टिक टिक करती
घड़ी की सुइयों से.
संभाल लूँ
सूखे फूलों की तरह
किताब में...
ठंडी हवा और
पत्तों की सरसराहट में
चिड़ियों की अठखेलियाँ
सहेज लूँ...
सुलझी, सुनहरी किरणों को
आँखों में भर लूँ...
ताज़गी और रौशनी
भोर की।
Wednesday, May 28, 2008
ये क्या हुआ?
किशोर का यह गाना मेरी हालत बयान कर सकता है- आप भी सुनिये और रहस्य सुलझा दीजिये-
http://www.esnips.com/doc/16603360-342d-430f-8b57-471a9c846066/06-Yeh-kya-hua
Wednesday, May 14, 2008
हाईकु (त्रिपदम)

(३)
छोटा बालक
रंग और कल्पना
चित्र बनाता।
Monday, April 07, 2008
पत्थर में प्रकटे प्राण

बादलों का स्नेह
हवा का स्पर्श
पत्थर में प्रकटे प्राण
सर्वत्र जीवन
सर्वत्र नियम
जीवन
व्यक्त करता
विकसित होता
पल पल खिलता
यही, एक भाव है...
या स्वभाव.
या फिर इससे भी परे
एक प्रभाव है-
शब्दों का
स्पर्श का, औ
रूप, रस, गंध का.
Sunday, February 03, 2008
हाईकु (त्रिपदम)
नदी का पानी
कल कल झरना
बहते हैं ना.
रुई के फाहे
बादलों पर छाए
वृक्ष नहाए.

करवट बदले
जीवन यही.
Thursday, January 03, 2008
सुकून
मकान मालकिन चित्रा को बोली -‘चलो उतर कर आलू, प्याज़ खरीद लाएँ।’
चित्रा ने दो किलो आलू, दो किलो प्याज खरीद लिये।
इतने में पीछे से दूसरा सब्जी वाला बोल पड़ा, ‘अरे दीदी, आज खाना क्या बनावेंगी। थोड़ी सब्जी तो ले लो। मटर, शलजम, बैंगन, गाजर और ये मशरूम और पालक बिल्कुल ताज़ा है।’
चित्रा मन ही मन सब्जी वाले की भी अच्छी मार्केटिंग से इम्प्रेस हो गई। दो, चार किलो सब्जी खरीद कर ऊपर जाने लगी कि सीढ़ियों पर मिसेज कपूर ने आँखों को बड़े ही अदब से नचाते हुए पूछा, ‘अरे चित्रा, बड़ी सब्जियाँ खरीदी जा रहीं हैं। रात को पार्टी शार्टी है क्या?’
‘यूँ बार बार एक एक सब्जी के लिये नीचे उतर कर आना मुझे बड़ा थका देता है इसलिये अब हफ्ते भर की सब्जी एक साथ खरीद ली बस।’
चित्रा सोचती रह गई कि कोई कुछ भी खरीदे, कुछ भी खाए, जैसे मर्जी रहे। लोग क्यों ताक झाँक करते हैं। घर से बाहर निकलो तो एक बार तो जरूर नज़र डालेंगे। मन ही मन सोचेंगे कि कहाँ जा रहे हैं। कहीं तो खुलापन हो, कहीं तो सुकून मिले। लोग अपने कौतुहल को शांत करने के लिये दूसरों की ज़िदगी में कितना दख़ल देते हैं। खुशबू से अंदाज़ लगाएँगे कि आज फलाने के घर क्या पका है। और जब उस पर भी क्षुधा शांत न हो तो पूछ भी लेंगे। सवाल पूछते हुए हिचकते भी नहीं... एक बार भी नहीं। कैसी ज़िंदगी जीते हैं लोग यहाँ।
अजी ज़िंदगी क्या, बस जी रहे हैं, साँसे ले रहे हैं और गौसिप का मसाला चाट रहे हैं।
इससे दूसरे व्यक्ति को कितनी परेशानी होती है इतना नहीं समझते लोग?
चित्रा सोचती जा रही थी और अपने आपको टेंशन में डालती जा रही थी।
पर टेंशन से क्या होता है, इसी सब से तो समाज बनता है। हम समाज का हिस्सा हैं तो हमसे लोग सवाल करेंगे ही और हमें जवाब भी देना होगा। सही सही बताना होगा कि घर में क्या पकाया है। पकाया का मतलब तो समझते हैं न, 'गौसिप’।
खैर कहानी आगे बढ़ गई है पर चित्रा तो कभी की कानों पर पिलो सेट कर के सो चुकी है। शायद उसे सुकून यहीं मिल सकता है।
Sunday, December 30, 2007
सराहना

देखा है मैंने
खुले आकाश के,
बांह पसारे
विस्तार को।
नदिया के रुख़ को
मचलते खेलते
बहने को।
हर उषा से
आशा की किरण को
महसूस किया है।
सलाखों के पीछे से
देख-सह-चुप रह कर
जिया है मैंने
हर दिन
हर पल को
और सराहा है उसे
जिसने मुझे यह सब
देखने दिया
चाहे सलाखों के पीछे से ही ।
Sunday, December 09, 2007
जीवन चक्र

भोर साँझ का खेल दिखाना
जीवन चक्र पर फिसले जाना
कहाँ हो अपना ठौर ठिकाना.
समय से हर पल ‘रेस’ लगाना
दिन भर तन को खूब तपाना
साँझ ढले पर पानी दाना
चल रे माझी घर है जाना.
Sunday, October 28, 2007
करवाचौथ पर कुछ हाईकु

आया भाग्य से
सुहागनों का दिन
करवाचौथ।
(2)
सोलह श्रृंगार सा
सुहागन का।
माँग सिन्दूरी चाँद पूजती।
ममता और प्रेम
सौभाग्यशाली।
जीवन हो सबका
यही प्रार्थना।
सीख - रविन्द्र नाथ टैगोर की कविता से
मेरा कार्य संभालेगा अब कौन
लगे पूछने साहब रवि
सुनकर सब जग रहा निरुत्तर मौन
ज्यों कोई निश्चल छवि
माटी का था दीपक एक
बोला यूँ झुककर-
- अपनी क्षमता भर प्रयास करूँगा प्रभुवर-
मम्मी उस रात को हम सभी को छोड़ गईं।
कुछ दिनों पहले किसी बैग से उसी अस्पताल की एक परची झांकती हुई दिखी, निकाला तो उसके पीछे वही लाईनें, ...एक बार फिर नज़र से फिर गईं, जिसे मेरे पति ने तब नोट कर लिया था। पढ़ कर सब याद आ गया। माँ की याद एक रिक्तता दे जाती है पर मैं अपने आप को माटी का दीपक समझने लगी हूँ...अपनी क्षमता भर प्रयास करने का वचन जो लिया है अब।



