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Wednesday, October 20, 2010

यादें


कई रंग रंगे
कई लिबास ओढ़े

यादें मिलती हैं
हवा के स्पर्श
और खुशबु के संग
संगीत में घुली हुई
उम्मीदों से भरी हुई।
पल- पल आतीं
पल-पल जातीं

हर पल बन जाती हैं
गुज़रे पल की यादें।

Sunday, May 09, 2010

कुछ शाइरी माँ के नाम

यहाँ बाहरेन में इत्तफाक़ से हमारे एक पुराने परिचित मिल गए। कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने पिताजी डा. कन्हैयालाल राजपुरोहित की लिखी किताब 'खुशबू का सफर' दी। 'खुशबू का सफर' में दोहों और शाइरी का संकलन है। मातृ दिवस पर बहुत कुछ पढ़ने को मिला, दिल भावुक भी हो गया। माँ की कमी बहुत बार बहुत खलती है पर दिल बेबस हो जाता है। अपने बच्चों को देखती हूँ तो लगता है कि क्या वही प्यार इनके दिल में भी है जो मेरे दिल में मेरी माँ के लिए है। खैर, दिल चाहा इसलिए 'खुशबू का सफर' से माँ के लिए कुछ शेर मैं यहाँ आपके साथ शेयर कर रही हूँ-



मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार
-निदा फ़ज़्ली

इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

ये ऐसा कर्ज है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है
-मुनव्वर राना

ऐ माँ तेरे चेहरे की झुर्रियों की क़सम
हर इक लकीर में जन्नत नज़र आती है
-अनवर ग़ाज़ी

हादसों से मुझे जिस शै ने बचाया होगा
वह मेरी माँ की दुआओं का साया होगा
-शम्स तबरेज़ी

घास में खेलता बच्चा पास बैठी माँ मुस्कुराती है
मुझे हैरत है क्यों दुनिया काबा-ओ-सोमनाथ जाती है
-अज्ञात


Sunday, October 28, 2007

सीख - रविन्द्र नाथ टैगोर की कविता से

आइ. सी. यू. में घुसते ही बायें हाथ पर एक नोटिस बोर्ड था। वैसे तो उस बोर्ड पर आइ. सी. यू. के पेशेंट्स के नाम, उनके डाक्टर के नाम आदि लिखे रहते थे पर कभी कभी वहाँ ड्यूटी पर बैठा डाक्टर किसी किताब में से, जिसे वो खाली समय में पढ़ता था, चंद लाईने जो उसे पसंद आतीं, मार्कर से लिस्ट के पास ही लिख देता था। मेरा दिन में बहुत बार आइ। सी. यू. में जाना होता था क्योंकि मम्मी वहाँ 214 नम्बर में एडमिट थीं। उनकी हालत बिगड़ती ही जा रही थी, आइ. सी. यू. में आने पर वो वेन्टीलेटर पर ही रहीं। जहाँ बाहर जूते उतारते थे उसके और नोटिस बोर्ड के बीच एक काँच का दरवाज़ा था तो जूते उतारते और पहनते समय नोटिस बोर्ड पर नज़र पड़ ही जाती थी। इस तरह किश्तों में वहाँ लिखा आँखों से फिर जाता था। उस दिन वहाँ रविन्द्र नाथ टैगोर की लिखी कविता की कुछ लाईनें नज़र आईं,

मेरा कार्य संभालेगा अब कौन
लगे पूछने साहब रवि
सुनकर सब जग रहा निरुत्तर मौन
ज्यों कोई निश्चल छवि
माटी का था दीपक एक
बोला यूँ झुककर-
- अपनी क्षमता भर प्रयास करूँगा प्रभुवर-


मम्मी उस रात को हम सभी को छोड़ गईं।
कुछ दिनों पहले किसी बैग से उसी अस्पताल की एक परची झांकती हुई दिखी, निकाला तो उसके पीछे वही लाईनें, ...एक बार फिर नज़र से फिर गईं, जिसे मेरे पति ने तब नोट कर लिया था। पढ़ कर सब याद आ गया। माँ की याद एक रिक्तता दे जाती है पर मैं अपने आप को माटी का दीपक समझने लगी हूँ...अपनी क्षमता भर प्रयास करने का वचन जो लिया है अब।
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