Friday, May 13, 2011

मेरी शाम


पत्तों पर खुरदरी
शाम जब गिरती है...
मैं चुपचाप
नदी किनारे पड़ी
रेत समेट लेती हूँ।
बौखलाई हुई
रात में
औंधे से आकाश में
उस खुशबू को
बिखेर देती हूँ।

Monday, May 02, 2011

प्रतिमा मेरे प्रिय की









अन्तस में प्रकाश की

किरणें उत्साह की

मदमस्त मुझे कर

ले चलीं

अनन्त सागर में

उज्ज्वल आँगन में

मौन पावन में...

…छोड़ चलीं...

किरणें प्रकाश की

लहरें उत्साह की

प्रतिमा मेरे प्रिय की।



Thursday, January 27, 2011

क्षणिकाएँ


{ अनुभूति में प्रकाशित पाँच क्षणिकाएँ }


(1)
उड़ते- घुमड़ते
गुज़र जाता है वक्त
साल दर साल
दबे पाँव
छोड़ जाता है
उम्र पर
जाने अनजाने
अपने सफर के निशान।


(2)
उफनती लहरें,
सरसराते पत्ते,
उड़ती हुई रेत
और हमारी साँसें
पिरो रखा है
हवा ने इन्हें
एकसाथ।

(3)

बंद मुट्ठी में
क्या बँध सका
हाथ खोला
और देखो तो
आसमान
सिमट कर
बाहों में आगया।

(4)
मौसम और इंसान
नहीं रहते
एक समान
वक्त के साथ
बदलते हैं
दोनों ही।

(5)

दो लोगों के बीच
ज़रूरी नहीं
शब्द और ज़ुबान हो
रिक्त आवाज़ को
बिन कहे बात को
दिल भी अक्सर
सुन लेता है।


Tuesday, October 26, 2010

मृत्युँजय


मन त्यौहारों की उमंग में रमा हुआ है। रामलीला, दशहरा, दीवाली फिर गोवर्धन पूजा। द्वापर और त्रेता युग दोनों का ही संबंध हो जाता है इस माह से। घर में सफाई करते हुए शिवाजी सावंत का लिखा उपन्यास 'मृत्युँजय' हाथ लग गया है। कुछ सालों पहले जब इसे पढ़ना शुरू किया था तब भी एक अलग आकर्षण सा महसूस किया था। पूरा उपन्यास बिना रुकावट के पढ़ डाला था। २३-२४ साल की आयु में अपना पहला उपन्यास इतने गम्भीर पात्र को लेकर लिखने वाले के दिल-दिमाग पर दानवीर कर्ण और महाभारत काल किस नशे जैसा रहा होगा कि उस नशे के चलते उन्होने अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं की। नशा ऐसा कि उसका असर आज भी पढ़ने वाले को महसूस हो जाता है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि चार-पाँच वर्षों में ही इसके चार संस्करण तथा पचास हज़ार प्रतियाँ प्रकाशित हो गईं। जब मैंने खरीदा था तब तक इसके तीस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे। कोई दैवीय शक्ति जैसे इस उपन्यास को उनसे लिखवाती रही। और शिवाजी के शब्दों में 'यह उपन्यास मेरा नहीं अब पाठकों का हो चुका है।'

आज दिल चाह रहा है कि उन तरंगों को एक बार फिर महसूस करूँ। ये भाव इतनी तीव्रता से उठे कि यहाँ शब्द बन गए। आपने अगर नहीं पढ़ा है तो एक बार ज़रूर पढ़ियेगा।

Wednesday, October 20, 2010

यादें


कई रंग रंगे
कई लिबास ओढ़े

यादें मिलती हैं
हवा के स्पर्श
और खुशबु के संग
संगीत में घुली हुई
उम्मीदों से भरी हुई।
पल- पल आतीं
पल-पल जातीं

हर पल बन जाती हैं
गुज़रे पल की यादें।

Sunday, May 09, 2010

कुछ शाइरी माँ के नाम

यहाँ बाहरेन में इत्तफाक़ से हमारे एक पुराने परिचित मिल गए। कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने पिताजी डा. कन्हैयालाल राजपुरोहित की लिखी किताब 'खुशबू का सफर' दी। 'खुशबू का सफर' में दोहों और शाइरी का संकलन है। मातृ दिवस पर बहुत कुछ पढ़ने को मिला, दिल भावुक भी हो गया। माँ की कमी बहुत बार बहुत खलती है पर दिल बेबस हो जाता है। अपने बच्चों को देखती हूँ तो लगता है कि क्या वही प्यार इनके दिल में भी है जो मेरे दिल में मेरी माँ के लिए है। खैर, दिल चाहा इसलिए 'खुशबू का सफर' से माँ के लिए कुछ शेर मैं यहाँ आपके साथ शेयर कर रही हूँ-



मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार
-निदा फ़ज़्ली

इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

ये ऐसा कर्ज है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है
-मुनव्वर राना

ऐ माँ तेरे चेहरे की झुर्रियों की क़सम
हर इक लकीर में जन्नत नज़र आती है
-अनवर ग़ाज़ी

हादसों से मुझे जिस शै ने बचाया होगा
वह मेरी माँ की दुआओं का साया होगा
-शम्स तबरेज़ी

घास में खेलता बच्चा पास बैठी माँ मुस्कुराती है
मुझे हैरत है क्यों दुनिया काबा-ओ-सोमनाथ जाती है
-अज्ञात


Thursday, May 06, 2010

किरणें रवि की ...




सूरज की लाली,
सिमटी और बदली

रंगों की चादर
आकाश में बिखरी

दिन चढ़ता रूप बदलता,
भाग रही धूप बावरी

परछाइयों पर फिर भी
खोज रहीं कुछ किरणें रवि की ...

Tuesday, April 27, 2010

"द ग्रेट पोइट्री रीडिंग डे" या " मेरी वापिसी"

सुबह रेडियो पर सुना कि आज "द ग्रेट पोइट्री रीडिंग डे" है। और मेरे लिए वापिसी का एक अच्छा मुहुर्त।
बहुत दिनों से सोच रही थी कि ब्लागजगत पर लिखने के अभ्यास में एक अंतराल आ रहा है। अंतराल की परिभाषाएँ हर एक के लिए अलग-अलग होती हैं पर निश्चित रूप से एक साल का अंतराल लंबा होता है। इस बीच बहुत कुछ पढ़ा, कुछ और जगह लिखा भी...पर स्लीपींग ब्लागर की श्रेणी में आने के बाद यहाँ से एक अच्छी स्लीप (ब्रेक) की ज़रूरत को मैंने नज़रअंदाज नहीं किया। वैसे ब्रेक के बाद तरोताज़ा होकर लौटने का आनन्द ही अलग है। लौटना कब और कैसे होगा, दिल इसी असमंजस में था पर देखिये ना! कभी-कभी संयोग भी कैसे बन जाता है।
आज "द ग्रेट पोइट्री रीडिंग डे" पर उन सभी कवियों को बार-बार याद कर रही हूँ जिनकी कविताएँ बचपन से पढ़ी हैं, कुछ तो गहरी दिल में उतर गई हैं। हरिवंशराय बच्चन और मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ पढ़ कर उनके प्रति एक सम्मान और प्रेम का रिश्ता दिल में कायम है। मैथिली जी की कविता "दोनों ओर प्रेम पलता है" उस समय मुझे काफी छू गई जब पहली बार पढ़ी थी इस कविता में उन्होनें लक्ष्मण के वन में चले जाने के बाद उर्मिला के दिल में उठ रहे विरह भावों को शब्दों में ढाला है­। जब यह कविता पहली बार पढ़ी तब हैरान रह गई थी यह सोच कर कि इस पहलू के बारे में मैथिली जी ने इतनी गहराई से लिख डाला है जिस पहलू पर शायद किसी की नज़र न जाती। हालांकि उस समय मैं छोटी थी पर दिल में आज भी यह कविता उतना ही गहरा अर्थ समझा जाती है।

हरिवंशराय बच्चन की एक कविता "नीड़ का निर्माण फिर फिर" भी उन कविताओं में से एक है जो मेरी डायरी में नोट की हुई है, ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं पर चाहती हूँ कि आज के दिन आपके साथ इस कविता को बाँटू। उम्मीद है कि निर्माण की बात कहती इस कविता के बाद मुझे सहर्ष वापिसी मिल जाएगी...

नीड़ का निर्माण फिर फिर, नेह का आह्वान फिर फिर

यह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अँधेरा
धुलिधुसर बादलों ने धरती को इस भाँती घेरा
रात सा दिन हो गया फिर रात आई और काली
लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा
रात के उत्पात-भय से भीत जन जन भीत कण कण
किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर .....

क्रुद्ध नभ के वज्रदंतो में उषा है मुस्कुराती
घोर-गर्जनमय गगन ने कंठ में खग-पंक्ति गाती
एक चिडिया चोंच में तिनका लिए जो जा रही हैं
वह सहज में ही पवन उनचास को नीचा दिखाती
नाश के भय से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता में सृष्टि का नवगान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर....

कवि - हरिवंशराय बच्चन

Monday, May 11, 2009

सपना


पलकों के पीछे
चुप चुप के
सपना सलोना।
रात भर
आकार लेता,
न जाने कब कहीं
खो गया।
पलकों में ही घुल गया,
या, रौशनी से डर गया,
बहुत ढूँढा
फिर लगा,
अपनी कहानी
वो जी गया।

Sunday, November 09, 2008

कसक


अपनी अतिव्यस्त सी होती हुई दिनचर्या में दिन ढलने के साथ साथ एक कसक भी पनपने लग रही थी। कलम कहीं आराम की आदि न बन जाये और कसक में कोशिश करने की आदत न रहे उससे पहले आपके साथ यह कविता बाँट लेती हूँ-





एक लम्हा चुरा लूँ
टिक टिक करती
घड़ी की सुइयों से.
संभाल लूँ
सूखे फूलों की तरह
किताब में...

ठंडी हवा और
पत्तों की सरसराहट में
चिड़ियों की अठखेलियाँ
सहेज लूँ...

आसमान से आती
सुलझी, सुनहरी किरणों को
आँखों में भर लूँ...
ताज़गी और रौशनी
भोर की।

Wednesday, May 28, 2008

ये क्या हुआ?

अपनी गृहस्थी में इस कदर व्यस्त रहने लगी कि ब्लाग पर मौन हो गई। ब्लागजगत तो हमेशा याद आता रहता है परंतु फुरसत के पल अब कीमती हो गए हैं। आपका प्यार पा कर बहुत खुशी होती है। पर मौन से कोई इस तरह जीत जाएगा यह नहीं पता था। पिछले तीन दिन से सोच रही हूँ कि यह पोस्ट लिख भेजूँ, आज समय निकाल ही लिया। 26 की रात को प्रिय बेजी का फोन आया। मौन जीत जाता है उन्होंने सहजता से दोहरा दी, मैने पूछा- पुरानी पोस्ट पढ़ने का समय कहाँ से चुरा लिया, बेजी। बेजी बोलीं पुरानी नहीं ये तो आज की पोस्ट है। मेरा माथा ठनका भई मुझे तो याद नहीं कि मैने अपनी पुरानी कविता फिर से डाली हो। माजरा समझ नहीं आया। उसी समय ब्लागवाणी खोला तो सबसे ज़्यादा पढ़े गए में अपना नाम पाया। देख कर खुशी तो हुई साथ में अचम्भा भी कि ये क्या हुआ। लिंक खोला तो देखा अजी मेरी ही कविता पर मुझसे पहले उड़न तश्तरी पहुँच गई, मीत, कुश का एक खूबसूरत ख्याल, विचारों की ज़मीं, डा. अनुराग, संदीप जी, शोभा जी सभी विराजे हैं। प्रतिक्रियाएँ इतनी अच्छी लगी कि दिल खुश हो गया। कविता को आप सभी ने बहुत सराहा, इससे भी ऊपर आपने मेरी भावनाओं को समझा। समीर जी मुझे भी नहीं पता कि बहुत पुरानी पोस्ट फिर से कैसे। मैं कम लिख पाती हूँ फिर भी आप सभी मुझे याद रखते हैं। पर मेरी समझ में नहीं आया कि ये मौन कैसे टूटा। मेरी 20 जुलाई 2006 की कविता आज अचानक कैसे उभर आई और पुरानी तारीख़ पर कमेंट्स कैसे मिल गये, क्या कहने इस मौन के। खूब दिमाग दौड़ाया पर यह रहस्य नहीं सुलझा। क्या आप लोग बता सकते हैं कि ये क्या हुआ?
किशोर का यह गाना मेरी हालत बयान कर सकता है- आप भी सुनिये और रहस्य सुलझा दीजिये-
http://www.esnips.com/doc/16603360-342d-430f-8b57-471a9c846066/06-Yeh-kya-hua

Wednesday, May 14, 2008

हाईकु (त्रिपदम)


(1)

स्वर्णिम आभा
बिखेरे दिनकर
अतिसुन्दर।




(२)

पेड़ की जड़ें
माटी भीतर सींचे
जीवन डोर।


(३)

छोटा बालक
रंग और कल्पना
चित्र बनाता।

Monday, April 07, 2008

पत्थर में प्रकटे प्राण


रक्त वर्ण कोंपलें
बादलों का स्नेह
हवा का स्पर्श
पत्थर में प्रकटे प्राण
सर्वत्र जीवन
सर्वत्र नियम

जीवन
व्यक्त करता
विकसित होता
पल पल खिलता
नन्हा सा...
निर्दोष सा...

यही, एक भाव है...
या स्वभाव.
या फिर इससे भी परे
एक प्रभाव है-
शब्दों का
स्पर्श का, औ
रूप, रस, गंध का.

Sunday, February 03, 2008

हाईकु (त्रिपदम)

(1)
ढलती साँझ
नीड़ की तलाश में
भटके पंछी।



(2)
नदी का पानी
कल कल झरना
बहते हैं ना.






(3)
रुई के फाहे
बादलों पर छाए
वृक्ष नहाए.







(4)
भोर औ सांझ
करवट बदले
जीवन यही.

Thursday, January 03, 2008

सुकून

बस थोड़ा सा सुकून मिल जाए। दिमाग़ भन्ना जाता है, उफ्फ यह शोर...कितना नोइस पोल्यूशन है यहाँ। पीं पीं होर्न बजता है गाड़ियों का। उसकी आवाज़ कानों पर नहीं हार्ट पर महसूस होती है। दूसरे फ्लोर की बालकोनी में खड़ी हुई चित्रा महानगर में कोई कोना शांति का खोज रही है। गली के छोर पर मिसेज वर्मा रिक्शे वाले से दो रूपये के लिये उलझी हुई हैं। उनके तर्क ऐसे लग रहे हैं जैसे मार्केटिंग में ताज़ा डिप्लोमा कर आईं हों। ओह कितना ज़ोर से बोलती हैं, आज पूरी गली को अपना हुनर दिखा देने की कोशिश में हैं। कोई किसी के बारे में नहीं सोचता, कितना चीखते हैं सभी। नीचे आलू प्याज वाले की आवाज़ ने अचानक ध्यान खींच लिया।
मकान मालकिन चित्रा को बोली -‘चलो उतर कर आलू, प्याज़ खरीद लाएँ।’
चित्रा ने दो किलो आलू, दो किलो प्याज खरीद लिये।
इतने में पीछे से दूसरा सब्जी वाला बोल पड़ा, ‘अरे दीदी, आज खाना क्या बनावेंगी। थोड़ी सब्जी तो ले लो। मटर, शलजम, बैंगन, गाजर और ये मशरूम और पालक बिल्कुल ताज़ा है।’
चित्रा मन ही मन सब्जी वाले की भी अच्छी मार्केटिंग से इम्प्रेस हो गई। दो, चार किलो सब्जी खरीद कर ऊपर जाने लगी कि सीढ़ियों पर मिसेज कपूर ने आँखों को बड़े ही अदब से नचाते हुए पूछा, ‘अरे चित्रा, बड़ी सब्जियाँ खरीदी जा रहीं हैं। रात को पार्टी शार्टी है क्या?’
‘यूँ बार बार एक एक सब्जी के लिये नीचे उतर कर आना मुझे बड़ा थका देता है इसलिये अब हफ्ते भर की सब्जी एक साथ खरीद ली बस।’
चित्रा सोचती रह गई कि कोई कुछ भी खरीदे, कुछ भी खाए, जैसे मर्जी रहे। लोग क्यों ताक झाँक करते हैं। घर से बाहर निकलो तो एक बार तो जरूर नज़र डालेंगे। मन ही मन सोचेंगे कि कहाँ जा रहे हैं। कहीं तो खुलापन हो, कहीं तो सुकून मिले। लोग अपने कौतुहल को शांत करने के लिये दूसरों की ज़िदगी में कितना दख़ल देते हैं। खुशबू से अंदाज़ लगाएँगे कि आज फलाने के घर क्या पका है। और जब उस पर भी क्षुधा शांत न हो तो पूछ भी लेंगे। सवाल पूछते हुए हिचकते भी नहीं... एक बार भी नहीं। कैसी ज़िंदगी जीते हैं लोग यहाँ।
अजी ज़िंदगी क्या, बस जी रहे हैं, साँसे ले रहे हैं और गौसिप का मसाला चाट रहे हैं।
इससे दूसरे व्यक्ति को कितनी परेशानी होती है इतना नहीं समझते लोग?
चित्रा सोचती जा रही थी और अपने आपको टेंशन में डालती जा रही थी।
पर टेंशन से क्या होता है, इसी सब से तो समाज बनता है। हम समाज का हिस्सा हैं तो हमसे लोग सवाल करेंगे ही और हमें जवाब भी देना होगा। सही सही बताना होगा कि घर में क्या पकाया है। पकाया का मतलब तो समझते हैं न, 'गौसिप’।
खैर कहानी आगे बढ़ गई है पर चित्रा तो कभी की कानों पर पिलो सेट कर के सो चुकी है। शायद उसे सुकून यहीं मिल सकता है।

Sunday, December 30, 2007

सराहना




देखा है मैंने
खुले आकाश के,
बांह पसारे
विस्तार को।
नदिया के रुख़ को
मचलते खेलते
बहने को।
हर उषा से
आशा की किरण को
महसूस किया है।
सलाखों के पीछे से
देख-सह-चुप रह कर
जिया है मैंने
हर दिन
हर पल को
और सराहा है उसे
जिसने मुझे यह सब
देखने दिया
चाहे सलाखों के पीछे से ही ।

Sunday, December 09, 2007

जीवन चक्र


धूप छाँव का आना जाना
भोर साँझ का खेल दिखाना
जीवन चक्र पर फिसले जाना
कहाँ हो अपना ठौर ठिकाना.

समय से हर पल ‘रेस’ लगाना
दिन भर तन को खूब तपाना
साँझ ढले पर पानी दाना
चल रे माझी घर है जाना.

Sunday, October 28, 2007

करवाचौथ पर कुछ हाईकु



(1)
आया भाग्य से
सुहागनों का दिन
करवाचौथ।



(2)
रूप निखरे
सोलह श्रृंगार सा
सुहागन का।

(3)
माँग सिन्दूरी
कलाई भर चूड़ी
चाँद पूजती।




(4)
नारी जीवन
ममता और प्रेम
सौभाग्यशाली।

(5)
खुशियों भरा
जीवन हो सबका
यही प्रार्थना।
(सुबह ‘सरगी’ करते हुए कुछ हाईकु बने, जिन्हें यहाँ सभी के साथ बाँट रही हूँ।)

सीख - रविन्द्र नाथ टैगोर की कविता से

आइ. सी. यू. में घुसते ही बायें हाथ पर एक नोटिस बोर्ड था। वैसे तो उस बोर्ड पर आइ. सी. यू. के पेशेंट्स के नाम, उनके डाक्टर के नाम आदि लिखे रहते थे पर कभी कभी वहाँ ड्यूटी पर बैठा डाक्टर किसी किताब में से, जिसे वो खाली समय में पढ़ता था, चंद लाईने जो उसे पसंद आतीं, मार्कर से लिस्ट के पास ही लिख देता था। मेरा दिन में बहुत बार आइ। सी. यू. में जाना होता था क्योंकि मम्मी वहाँ 214 नम्बर में एडमिट थीं। उनकी हालत बिगड़ती ही जा रही थी, आइ. सी. यू. में आने पर वो वेन्टीलेटर पर ही रहीं। जहाँ बाहर जूते उतारते थे उसके और नोटिस बोर्ड के बीच एक काँच का दरवाज़ा था तो जूते उतारते और पहनते समय नोटिस बोर्ड पर नज़र पड़ ही जाती थी। इस तरह किश्तों में वहाँ लिखा आँखों से फिर जाता था। उस दिन वहाँ रविन्द्र नाथ टैगोर की लिखी कविता की कुछ लाईनें नज़र आईं,

मेरा कार्य संभालेगा अब कौन
लगे पूछने साहब रवि
सुनकर सब जग रहा निरुत्तर मौन
ज्यों कोई निश्चल छवि
माटी का था दीपक एक
बोला यूँ झुककर-
- अपनी क्षमता भर प्रयास करूँगा प्रभुवर-


मम्मी उस रात को हम सभी को छोड़ गईं।
कुछ दिनों पहले किसी बैग से उसी अस्पताल की एक परची झांकती हुई दिखी, निकाला तो उसके पीछे वही लाईनें, ...एक बार फिर नज़र से फिर गईं, जिसे मेरे पति ने तब नोट कर लिया था। पढ़ कर सब याद आ गया। माँ की याद एक रिक्तता दे जाती है पर मैं अपने आप को माटी का दीपक समझने लगी हूँ...अपनी क्षमता भर प्रयास करने का वचन जो लिया है अब।

Saturday, October 27, 2007

उम्मीदें

सन्डे को आपकी छुट्टी है क्या? मुझे दिक्कत होगी अकेले बच्चों के साथ जब रिपेयरिंग का काम करने के लिए लेबर आ जाएगी! याद है पिछले हफ्ते ही तो मकान मालिक ने बोला था, ''सन्डे को आपका काम शुरू हो जाएगा।'' रेवा ने विनीत को याद दिलाया।
''उन्होने कहा था पर ऐसा नहीं होता रेवा। बोलने और होने में बहुत टाइम लगता है। दो तीन महीने तो लग ही जाएँगे। याद है मकान मलिक से बात किये मुझे डेढ़ महीना हो चुका था तब वो पिछले हफ्ते देख कर गये थे, तुम आराम से रहो।'' विनीत थोड़ा गुस्से में बोला।
रेवा भी सोचने लगी कि सही तो कह रहा है विनीत, ऐसा ही होता है। किसे फुरसत है दूसरे का काम याद रखने की, फिर किराया तो मिल रहा है उन्हें। मकानमालिक को क्या चिंता। पिछले किराएदारों ने घर की हालत बहुत खराब कर दी थी। दीवार, दरवाजे, नल, गीज़र सभी को रिपेयरिंग चाहिए थी। यहाँ तक कि फर्श भी इतना गंदा था कि चार घंटे मेड को बुलवा कर साफ करवाया था हमने।
आज सफाई करते हुए रेवा मन ही मन सोच रही थी अभी तीन ही दिन हुए हैं और इन तीन दिनों में सारा काम हो गया। दीवारें, दरवाजे, नल, गीज़र सभी ठीक कर गए लेबर और ज्यादा परेशानी भी नहीं हुई। ''हमने नाहक ही मकानमालिक की गलत धारणा अपने मन में बना ली। शायद सभी एक जैसे नहीं होते, किसी के बारे में पहले से अनुमान लगाना बाद में अक्सर गलत साबित हो जाता है और सच ही तो है कि उम्मीदें छोड़ दो तभी वो पूरी होती हैं।''
आज विनीत जब आफिस से आएंगे तो घर नया सा मिलेगा।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...