सहलाती रही हवा रात भर, रेत पर पड़ी सलवटें । भोर की लालिमा लिये, दिन चढ़ा सुनहरा रेगिस्तान जाग उठा । ठंडी हवा फिर चली अतीत की यादें मिटा आज को संवारती रेत पर फेरती उंगलियां, अद्भुद है यह दिन ।
शुरु से ही कहानी, कविता पढ़ने और लिखने के प्रति आकर्षण रहा है। आंखों के पीछे, मन के अंदर कई इच्छाएँ जन्म लेती हैं, वहाँ एक अलग दुनिया बसती है। कभी पन्ने पर निकल कर कहानी का रूप ले लेती है तो कभी कविता बन जाती है। पर अक्सर वो जी उठती हैं। लिखने, पढ़ने के अलावा रंगों की दुनिया भी बहुत मन बहलाती है। जैसे लिखना और पढ़ना पसंद है वैसे ही संगीत सुनना भी बहुत भाता है फिर चाहे वह क्लासिकल, भजन, फिल्मी, गज़ल कोई भी प्रकार हो।